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याद आता है

जब मेज़ पर पड़े कंप्यूटर से नज़र हटकर सामने खिड़की से बहार को जाती है तो कुछ याद आता है। जब अकेला छत पर बैठा तारों को गिनता हूँ तो कुछ याद आता है। याद आता है वो बचपन का घर जो अपना लगता था।  याद आतें  हैं वो दोस्त जिनको अपना समझता था। वो पापा की राजदूत, जिसपे बैठ कर किसी हवाई जहाज सा लगता था। वो भैया की साइकिल , जिसके लिए लड़ता था।  आज वो साइकिल तो नहीं हैं और ना ही पापा की राजदूत है पर उनकी यादें हैं जिन्हे बाँटना चाहतें भी नहीं बाँट सकता।  याद आता है नानी का गाँव जहाँ आम और लीची खाते-खाते पेट तो भर जाता पर मन नहीं।  वो तालाब जहाँ रोज़ नानाजी की  मछली पकड़ने वाली छड़ी ले जाता था पर कभी पकड़ ना पाया। एक भैंस भी तो थी जिसकी सवारी करने का मज़ा ही अलग था, जिसके बछड़े की आवाज़ की नक़ल करके उसे बुलाता था। लालटेन की रौशनी में पढ़ने का मज़ा आज के चमक धमक वाले कमरों में कहाँ। रोज़ ड्यूटी थी मेरी और भैया की, लालटेन में तेल भरने की और उसकी शीशी साफ़ करने की। जॉब रात में गर्मी बढ़ जाती, तब तारों के निचे बैठ के सारे पहाड़ें याद करतें थें।ग...